परम पूज्य श्री श्री 108 श्री चंद्र नाथ अघोरी जी महाराज
परम पूज्य श्री श्री 108 श्री चंद्र नाथ अघोरी जी महाराज 'शिव शक्ति धाम सरकार' के वर्तमान पीठाधीश्वर हैं। भगवान दत्तात्रेय, आदि-गुरु शिव स्वरूप गुरु मछंदरनाथ जी और योगिराज गुरु गोरखनाथ जी द्वारा प्रारंभ की गई प्राचीन नाथ संप्रदाय की परंपरा के अंतर्गत, वह इस गूढ़ आध्यात्मिक विरासत के आधुनिक ध्वजवाहक हैं। परम पूज्य दादा गुरु महाराज के पदचिह्नों पर चलते हुए और कठोर पारंपरिक ,अनुशासन का पूर्णतः पालन करते हुए, उन्होंने इस प्राचीन स्थान को आध्यात्मिक चेतना एवं जन-कल्याण के एक भव्य और दिव्य केंद्र में परिणत कर दिया है।
गौरवशाली वंश एवं गोत्र
भागीरथी गोत्र: गुरु महाराज का संबंध अत्यंत प्राचीन 'भागीरथी गोत्र' से है। यह वही पावन गोत्र है जिसका उद्गम महान तपस्वी राजा भगीरथ से हुआ था, जो अपनी कठोर तपस्या के बल पर माँ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे।
रघुवंशी विरासत: चूँकि राजा भगीरथ स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पूर्वज थे, अतः गुरु महाराज का संबंध सीधे सूर्यवंशी (रघुवंशी) परंपरा से जुड़ता है। उनका जीवन और उनकी सेवा-भावना 'रघुकुल रीति' के मूल आदर्शों को दर्शाती है—शरणागत की रक्षा, अटूट सत्यनिष्ठा और निस्वार्थ सेवा ही उनके जीवन का मूल मंत्र है।


आध्यात्मिक सिद्धियां एवं ईश्वरीय कृपा "अंतर्यामी" गुरु के रूप में वंदनीय, श्री चंद्र नाथ अघोरी जी महाराज पर "52 डोर की रानी" महामाई माँ आशु मेहतरानी का साक्षात् आशीर्वाद और सर्वोच्च कृपा है। यह ईश्वरीय कृपा उन्हें अद्वितीय आध्यात्मिक क्षमताएं प्रदान करती है:
जिस प्रकार एक माँ बिना कुछ कहे अपने बच्चे की पीड़ा समझ लेती है, ठीक वैसे ही गुरु महाराज महामाई के आशीर्वाद से भक्तों के अनकहे दुखों को भांप लेते हैं और अपनी दिव्य दृष्टि व शक्ति से उनका कल्याण करते हैं।
अपनी कठोर साधना और तपोबल से, वे भक्तों के जटिल से जटिल कष्टों को दूर करने के लिए अचूक सामग्रियां सिद्ध करते हैं:
सिद्ध लौंग : महामाई की शक्ति से अभिमंत्रित यह लौंग भक्त के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना देती है। इसके सेवन मात्र से भीषण तंत्र-बाधाएं, ऊपरी चक्र और नकारात्मक शक्तियां तत्काल निष्प्रभावी हो जाती हैं।
अभिमंत्रित जल (पढ़ा हुआ जल): गुरु महाराज द्वारा सिद्ध किया गया यह जल साक्षात् दिव्य औषधि के समान है, जो शरीर में प्रवेश करते ही असाध्य रोगों की जड़ पर प्रहार करता है और भक्त को निरोगी काया प्रदान करता है।
सिद्ध भभूत: पीढ़ियों से पूजित 'चैतन्य धुने' की यह पावन भस्म, गुरु कृपा से सिद्ध होकर, शरीर पर स्पर्श मात्र से दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का समूल नाश करती है।


